रुद्राभिषेक दक्षेस्वर महादेव जी
रुद्राभिषेक दक्षेस्वर महादेव जी
कनखल के में स्थित दक्ष महादेव मंदिर, भगवान शिव का एक प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर को यह नाम भगवान की शिव अद्धांगिनी देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति के नाम से मिला है। “कनखल भगवान शिव की ससुराल है।”
हरिद्वार में “शक्ति त्रिकोण” है। इसके एक कोने पर माता जी के सती होने का का प्रसिद्ध स्थान है “दक्ष”।
भोलेनाथ अपने नाम के अनुरूप बहूत भोले हैं। भगवान शिव एक लोटा जल से भी प्रसन्न होकर अपने भत्तों के सारे कष्ट हर लेते हैं। शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से व्याक्ति की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। वहीं महा-रूद्राभिषेक करने से व्यक्ति की कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भास्म हो जाते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रूद्राभिषेक पूजा 3 प्रकार की होती है।
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1 पंडित द्वारा 3 दिन का पूजन।
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1 पंडित द्वारा 2 दिन का पूजन।
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1 पंडित द्वारा 1 दिन का पूजन।
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Price : Rs 11,700
दक्षेस्वर महादेव मंदिर कनखल हरिद्वार उत्तराखण्ड में स्थित है कनखल दक्षेस्वर महादेव मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से सबसे अधिक जाना जाता है। दक्षेस्वर महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं। यह मंदिर शिव भक्तों के लिए भक्ति और आस्था की एक पवित्र जगह है। हिन्दु कैलेंडर के अनुसार सावन का महींना शिव भक्तों के लिए मुख्य आकर्षण के केन्द होता है। भगवान शिव का यह मंदिर सती के पिता राजा दक्ष प्रजापित के नाम पर है। 1962 में इस मंदिर का पुनः निर्माण किया गया था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा दक्ष प्रजापति भगवान ब्रह्मा जी के पुत्र थे और सती के पिता थे। सती भगवान शिव की प्रथम पत्नी थी। राजा दक्ष ने इस जगह एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतो को आमंत्रित किया। इस यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था। इस घटना से सती ने अपमानित महसूस किया क्योंकि सती को लगा राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया है। सती ने यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिये। इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए । शिव के गणों ने दक्ष की इस हरकत पर क्रुध होकर दक्ष का वध कर डाला। वीरभद्र ने राजा दक्ष का सिर काट दिया। सभी देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को जीवन दान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया। राजा दक्ष को अपनी गलतियों को एहसास हुआ और भगवान शिव से क्षमा मांगी। तब भगवान शिव ने घोषणा कि हर साल सावन के महीनें में भगवान शिव कनखल में निवास करेगें।
“यज्ञ कुण्ड के स्थान पर दक्षेस्वर महादेव मंदिर बनाया गया था तथा ऐसा माना जाता है कि आज भी यज्ञ कुण्ड मंदिर में अपने स्थान पर है।”
हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रूद्राभिषेक से हमारी कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रुद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका अर्थात सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा हैं। हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रूद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। भक्त रूद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिए तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रूद्राभिषेक किया जाता है।
भोलेनाथ सबसे सरल उपासना से भी प्रसन्न होते हैं लेकिन रूद्राभिषेक उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय है। कहते हैं कि रूद्राभिषेक से शिव जी को प्रसन्न करके आप असंभव को भी संभव करने की शक्ति पा सकते हैं तो आप भी सही समय पर रूद्राभिषेक करिए और “शिव कृपा के भागी बनिए…”
रूद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं :-
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जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
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असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से अभिषेक करें।
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भवन-वाहन के लिए दही से अभिषेक करें।
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लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से अभिषेक करें।
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धनवृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
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तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है।
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पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से अभिषेक करें।
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रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
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ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/ गंगाजल से अभिषेक करें।
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सहस्रनाम मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से अभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
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प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।
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शकर मिले दूध से अभिषेक करने पर जड़बुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
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सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
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शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
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पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से अभिषेक करें।
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गोदुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
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पुत्र की कामना वाले व्यक्ति शकर मिश्रित जल से अभिषेक करें। ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है।
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आदि
अलग-अलग शिवलिंग और स्थानों पर रुद्राभिषेक करने का फल भी अलग होता है। रूद्राभिषेक घर से ज्यादा मंदिर में, नदी तट पर और सबसे ज्यादा पर्वतों पर फलदायी होता है।
विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों में मंत्र, गोदुग्ध या अन्य दूध मिलाकर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सबको मिलाकर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है किंतु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाए तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है। रूद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है।
वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। पुराणों में तो इससे संबंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है। वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में कहा गया है और बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काटकर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था, जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया।
भस्मासुर ने शिवलिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओं से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।
कालसर्प योग, गृहक्लेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यों की बाधाओं को दूर करने के लिए महा-रूद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।
ज्योतिर्लिंग एवं तीर्थस्थान तथा शिवरात्रि प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वों में शिववास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। रूद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं।
स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है कि जब हम अभिषेक करते हैं तो स्वयं महादेव साक्षात उस अभिषेक को ग्रहण करते हैं। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नहीं है, जो हमें रूद्राभिषेक “करने या करवाने” से प्राप्त नहीं हो सकता है।
रुद्राभिषेक पूजा प्रक्रिया विवरण :-
1 पंडित द्वारा 3 दिन का पूजन :-
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पूजा के लिये दिनों की कुल संख्या : 3 no.
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पूजा के लिये पंडितों की कुल संख्या : 1 no.
1 पंडित द्वारा 2 दिन का पूजन :-
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पूजा के लिये दिनों की कुल संख्या : 2 no.
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पूजा के लिये पंडितों की कुल संख्या : 1 no.
1 पंडित द्वारा 1 दिन का पूजन :-
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पूजा के लिये दिनों की कुल संख्या : 1 no.
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पूजा के लिये पंडितों की कुल संख्या : 1 no.
1 पंडित द्वारा 3 दिन का पूजन :-
चैरिटी : Rs. 11,700/Couple/Head
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पूजा के लिये समस्त पूजन सामग्री : Rs. 5100
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पूजा के लिये प्रत्येक पंडित को दक्षिणा : Rs. 1100/पंडित/दिन
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पूजा के लिये एक दिन का यज्ञशाला के लिये दान : Rs. 1100/दिन (Optional)
1 पंडित द्वारा 2 दिन का पूजन :-
चैरिटी : Rs. 9,500/Couple/Head
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पूजा के लिये समस्त पूजन सामग्री : Rs. 5100
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पूजा के लिये प्रत्येक पंडित को दक्षिणा : Rs. 1100/पंडित/दिन
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पूजा के लिये एक दिन का यज्ञशाला के लिये दान : Rs. 1100/दिन (Optional)
1 पंडित द्वारा 1 दिन का पूजन :-
चैरिटी : Rs. 4,300/Couple/Head
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पूजा के लिये समस्त पूजन सामग्री : Rs. 2100
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पूजा के लिये प्रत्येक पंडित को दक्षिणा : Rs. 1100/पंडित
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पूजा के लिये एक दिन का यज्ञशाला के लिये दान : Rs. 1100 (Optional)





