दान

धर्म के चार पाँव कहे गए हैं. सत, तप, दया और दान।

  • इनमें से सतयूग में सत चला गया,

  • त्रेता में तप चला गया,

  • फिर द्वापर युग में महाभारत में भाइयों द्वारा भाइयों के वध से दया भी गई,

  • अब कलियुग चल रहा है जिसमें धर्म का एकमात्र पाँव दान बचा है

इसलिए मनुष्य को भवसागर पार करने के लिए अपने सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करना चाहिये।

सनातन नियम रहा है :- प्रत्येक धर्मनिष्ठ को अपनी आय का दशांश एवं भोजन का चतुर्थाश प्रत्येक दान कर देना चाहिए। दानशीलता उनके लिए कई प्रकार से रक्षा कवच तैयार करती है।

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पाप धेनु दान :  पापों से छुटकारा पाने के लिए।
करज मुक्ति धेनु दान :  ऋणों से मुक्ति
मोक्ष धेनु दान :  मोक्ष के लिए (आत्मज्ञान)
प्रयास्तचित धेनु दान :  क्षमा मांगने के लिए
वैतरणी धेनु दान :  मोक्ष (आत्मज्ञान) के लिए व्यक्ति के जीवन के अंतिम दिनों में गाय दान।

दान का शाब्दिक अर्थ है – ‘देने की क्रिया’। सभी धर्मों में सुपात्र को दान देना परम् कर्तव्य माना गया है। सनातन/हिन्दू धर्म में दान की बहुत महिमा बतायी गयी है। आधुनिक सन्दर्भों में दान का अर्थ किसी जरूरतमन्द को सहायता के रूप में कुछ देना है।

दान के तीन रूप :                                                                                                                                          नित्य, नैमित्तिक और काम्य ये दान के तीन रूप हैं। जो दान हर रोज दिया जाता है वह नित्य दान कहा जाता है। जो दान खास अवसर जैसे ग्रहण वगैरह के समय में दिया जाता है उसे नैमित्तिक कहा जाता है। काम्य दान उसे कहते जिसे करने पर किसी कामना की पूर्ति इसी श्रेपती में आते हैं। गीता में दान को सात्विक, राजसी और तामसी इन तीन श्रेणियों में बांटा गया है। सात्विक दान वह हैं जो देश काल और पात्र के अनुसार कर्तव्य समझ कर किया जाता है और दान लेने वाला उसे अस्वीकार नहीं करता। राजसी दान वह है जो किसी इच्छा की पूर्ति के लिए उत्साह के बिना किया जाता है। तामसी दान वह है जो अनुचित काल, स्थान और पात्र को श्रद्धा के बिना दिया जाता है।

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बैल दान

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