बच्चों के लिए मुंडन या सिर मुंडाना समारोह कई वर्षों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। यह हिंदू संस्कृति में पालन किए जाने वाले पारंपरिक अनुष्ठानों में से एक है और इसके अस्तित्व से बहुत सारे छिपे हुए संदर्भ और महत्व हैं। मुंडन समारोह को अक्सर बच्चे के बढ़ते वर्षों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, और इसलिए, इसे बहुत अधिक विचार और प्रयास दिया जाता है और यह अत्यंत सावधानी के साथ किया जाता है। सनातन/हिंदू परंपरा में इस संस्कार को पूरे विधि-विधान से मंत्रों का उच्चारण करते हुए संपन्न किया जाता है।
माना जाता है कि शिशु जब माता के गर्भ से बाहर आता है तो उस समय उसके केश अशुद्ध होते हैं। शिशु के केशों की अशुद्धि दूर करने की क्रिया ही चूड़ाकर्म संस्कार कही जाती है। दरअसल हमारा सिर में ही मस्तिष्क भी होता है इसलिये इस संस्कार को मस्तिष्क की पूजा करने का संस्कार भी माना जाता है। जातक का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहे व वह अपने दिमाग को सकारात्मकता के साथ सार्थक रुप से उसका सदुपयोग कर सके यही चूड़ाकर्म संस्कार का उद्देश्य भी है। इस संस्कार से शिशु के तेज में भी वृद्धि होती है।
चूड़ाकर्म संस्कार किसी शुभ मुहूर्त को देखकर किया जाता है। इस संस्कार को किसी पवित्र धार्मिक तीर्थ स्थल पर किया जाता है। इसके पिछे मान्यता है कि जातक पर धार्मिक स्थल के दिव्य वातावरण का लाभ मिले। एक वर्ष की आयु में जातक के स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ने के आसार होते हैं इस कारण इसे पहले साल के अंत में या तीसरे साल के अंत से पहले करना चाहिये। मान्यता है कि शिशु के मुंडन के साथ ही उसके बालों के साथ कुसंस्कारों का शमन भी हो जाता है व जातक में सुसंस्कारों का संचरण होने लगता है। शास्त्रों में लिखा भी मिलता है कि “तेन ते आयुषे वपामि सुश्लोकाय स्वस्त्ये”। इसका तात्पर्य है कि मुंडन संस्कार से जातक दीर्घायु होता है। यजुर्वेद तो यहां तक कहता है कि दीर्घायु के लिये, अन्न ग्रहण करने में सक्षम करने, उत्पादकता के लिये, ऐश्वर्य के लिये, सुंदर संतान, शक्ति व पराक्रम के लिये चूड़ाकर्म अर्थात मुंडन संस्कार करना चाहिये।